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भगवान शनि देव है न्याय और कर्मों का देवता : जानिए शनिवार व्रत कथा : इन्होंने किया था पहली बार शनिवार का व्रत, ऐसी है शनिदेव की महिमा

January 07, 2022 11:21 PM

सूर्यपुत्र भगवान शनि देव को न्याय और कर्मों का देवता माना जाता है। 9 ग्रहों के समूह में इन्हें सबसे क्रूर और गुस्सैल माना गया है। लेकिन ऐसा हर किसी के साथ नहीं होता। शनिदेव केवल उन्हीं लोगों को परेशान करते हैं, जिनके कर्म अच्छे नहीं होते और भगवान शनिदेव जिस पर महरबान होते हैं उसे धन धान्य से परिपूर्ण कर देते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि महाराज एक ही राशि में 30 दिनों तक रहते हैं।

ऐसा माना जाता है भगवान शिव ने शनिदेव को नौ ग्रहों में न्यायधीश का कार्य सौंपा है। शनि महाराज की आपने वैसे तो कई कथाएं सुनी होंगी, लेकिन आज हम आपके लिए भगवान शनिदेव के जन्म की अद्भुत कथा लेकर आए हैं। जिसे पढ़कर आप पापों से मुक्ति पा सकते हैं।

हिदु धर्म में भगवान शनि देव के जन्म की अनेकों कथाएं मौजूद है। जिसमें सबसे अधिक प्रचलित कथा स्कंध पुराण के काशीखंण्ड में मौजूद है। इसके अनुसार भगवान सूर्यदेव का विवाह राजा दक्ष की कन्या संज्ञा के साथ हुआ। भगवान सूर्यदेव और संज्ञा से तीन पुत्र वैस्वत मनु, यमराज और यमुना का जन्म हुआ। लेकिन संज्ञा भगवान सूर्यदेव के अत्यधिक तेज और तप सहन नहीं कर पाती थी। सूर्यदेव के तेजस्विता के कारण वह बहुत परेशान रहती थी। इसके लिए संज्ञा ने निश्चय किया कि उन्हें तपस्या से अपने तेज को बढ़ाना होगा और तपोबल से भगवान सूर्यदेव की अग्नि को कम करना होगा। इसके लिए संज्ञा ने सोचा कि किसी एकांत जगह पर जाकर घोर तपस्या करना होगा। संज्ञा ने अपने तपोबल और शक्ति से अपने ही जैसी दिखने वाली छाया को उत्पन्न किया। जिसका नाम सुवर्णा रखा।

इसके बाद संज्ञा ने छाया को अपने बच्चों की जिम्मेदारी सौंपा और उन्होंने तपस्या के लिए घने जंगल में शरण ले लिया। कुछ दिन बाद भगवान सूर्यदेव औऱ छाया के मिलन से तीन बच्चों मनु, शनिदेव और पुत्री भद्रा का जन्म हुआ। यह कथा हिंदु धर्म में काफी प्रचलित है।

दूसरी प्रचलित कथा : वहीं भगवान शनिदेव के जन्म की स्कंध काशी पुराण में एक और कथा मौजूद हैं। जिसके अनुसार कश्यप मुनि के वंशज भगवान सूर्यनारायण की पत्नी छाया ने संतान की प्राप्ति के लिए घोर तपस्या के जरिए भगवान शिव से संतान प्राप्ति का वर मांगा। भगवान शिव के फल से ज्येष्ठ की अमावस्या में भगवान शनिदेव का जन्म हुआ। सूर्य के तेज और तप के कारण शनिदेव का रंग काला हो गया। लेकिन माता की घोर तपस्या के कारण शनि महाराज में अपार शक्तियों का समावेश हो गया।

ऐसे मिला था शनिदेव को नौ ग्रहों के स्वामी का वरदान

कहा जाता है कि एक बार भगवान सूर्यदेव पत्नी छाया से मिलने आए, सूर्यदेव के तप और तेज के कारण शनिदेव महाराज ने अपनी आंखें बंद कर ली और वह उन्हें देख नहीं पाए। भगवान शनि के वर्ण को देख सूर्यदेव ने पत्नी छाया पर संदेह व्यक्त किया औऱ कहा कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता। इसके चलते शनिदेव के मन में सूर्य के प्रति शत्रुवत भाव पैदा हो गया। इसके बाद शनिदेव महाराज ने भगवान शिव की कड़ी तपस्या की। भगवान शिव ने शनिदेव की कड़ी तपस्या से प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा, जिस पर शनिदेव ने भगवान शिव से कहा कि सूर्यदेव उनकी माता को प्रताड़ित और अनादर करते हैं। इससे उनकी माता को हमेशा अपमानित होना पड़ता है। उन्होंने सूर्य से अधिक शक्तिशाली और पूज्यनीय होने का वरदान मांगा। इस पर भगवान शिव ने शनिदेव को वरदान दिया कि वह नौ ग्रहों के स्वामी होंगे यानि उन्हें सबसे श्रेष्ठ स्थान की प्राप्ति होगी। इसके साथ ही सिर्फ मानव जाति ही नहीं बल्कि देवता, असुर, गंधर्व, नाग और जगत का हर प्रांणि जाति उनसे भयभीत होगा।

ज्योतिशास्त्र के अनुसार शनि ग्रह

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि की धरती से दूरी लगभग नौ करोड़ मील है औऱ इसकी चौड़ाई एक अरब बयालीस करोड़ साठ लाख किलोमीटर है। इसका बल धरती से पंचानवे गुना अधिक है। शनि को सूर्य की परिक्रमा करने में उन्नीस वर्ष लगते हैं

शनिवार व्रत कथा : इन्होंने किया था पहली बार शनिवार का व्रत, ऐसी है शनिदेव की महिमा

शनिवार को शनिदेव की पूजा करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के दौरान शनि के प्रभाव व्यक्ति पर पड़ते हैं जिसके कारण वह परेशानियों से घिर जाता है। लेकिन शनिदेव के कष्टों से मुक्ति पाने के लिये हर शनिवार को व्रत कर कथा पढ़ना चाहिये। इससे शनि के प्रकोपों से मुक्ति मिलती है..

शनिवार व्रत कथा-

एक बार ब्रह्मांड के नवग्रहों में आपस में विवाद हो गया। वे सभी तय करना चाहते थे कि उनमें सबसे बड़ा कौन है ? इस विवाद का हल निकालने वे सभी देवराज इंद्र के पास पहुंचे। इंद्र ने विवाद से बचने के लिए नवग्रहों से कहा कि धरती पर उज्जैन में विक्रमादित्य नाम का राजा है, जो सदा न्याय करता है। वही आपके विवाद का निर्णय कर सकता है। इंद्र की बात मान नवग्रह राजा विक्रमादित्य के पास अपना मामला लेकर पहुंचे। राजा जानते थे कि वे जिसे छोटा बताएंगे, वही कुपित हो जाएगा, पर वे न्याय की राह नहीं छोड़ना चाहते थे।

राजा ने नव धातुओं के नौ सिंहासन बनाए और हर ग्रह को उनके अनुरूप क्रमशः स्थान ग्रहण करने को कहा। इस तरह लोहे का सिंहासन सबसे बाद में था, जो शनिदेव का था। इस तरह शनिदेव को सभी ग्रहों में अंतिम स्थान मिला। इससे शनिदेव राजा पर कुपित हो गए और अपना समय आने पर विक्रमादित्य को दुख देने की चेतावनी देकर चले गए।

राजा विक्रमादित्य की शनि की साढ़े साती

समय के साथ राजा विक्रमादित्य की कुंडली में शनि की साढ़े साती आई। इसी समय शनिदेव घोड़े के सौदागर बन कर राजा के पास आए। राजा विक्रमादित्य एक घोड़ा पसंद कर जैसे ही उसकी सवारी करने लगे, वह राजा को लेकर जंगल में भाग गया और गायब हो गया। जंगल में भटककर राजा किसी नए देश जा पहुंचे। वहां एक शहर में एक सेठ से बात करने लगे। सेठ के यहां उनके पहुंचते ही खूब सामान बिका, तो वह प्रसन्न होकर राजा को भोजन कराने घर ले गया। भोजन करते हुए राजा ने देखा कि एक खूंटी पर हार लटका है और वह खूंटी ही उसे निगल रही है। राजा के भोजन करने पर सेठ ने खूंटी पर हार ना पाया, तो उसे अपने राजा के यहां कैद करवा दिया। राजा ने चोरी के आरोप में विक्रमादित्य के हाथ कटवा दिए।

इसके बाद विकलांग राजा को एक तेली अपने घर ले गया और कोल्हू के बैलों को हांकने का काम दे दिया। इस तरह साढ़े सात साल बीत गए और एक रात शनि की महादशा समाप्त होते ही विक्रमादित्य ने ऐसा राग छेड़ा कि राज्य की राजकुमारी ने उनसे विवाह का प्रण ले लिया। लाख समझाने पर भी राजकुमारी ना मानी तो राजा ने विकलांग विक्रमादित्य से अपनी राजकुमारी का विवाह कर दिया। रात्रि में शनिदेव ने विक्रमादित्य के सपने में आकर कहा कि तुमने मुझे सबसे छोटा ठहराया था ना। अब देखो मेरा ताप और बताओ कि किस ग्रह में मेरे जितना प्रकोप है ?

राजा ने शनिदेव से माफी मांगी जिसके बाद शनिदेव ने उन्हें माफी दी। सुबह सब तरफ राजा विक्रमादित्य और शनिदेव की कथा की चर्चा होने लगी। विक्रमादित्य की जानकारी मिलते ही वह व्यापारी भी माफी मांगने आया और उन्हें फिर भोजन का निमंत्रण दे गया। राजा जब उसके यहां भोजन कर रहे थे तो उसी खूंटी ने सबके सामने हार वापस उगल दिया। इस तरह सभी के सामने स्पष्ट हो गया कि राजा ने चोरी नहीं की थी। व्यापारी ने राजा से कई बार माफी मांगी और अपनी कन्या का विवाह उनके साथ कर दिया। राजा विक्रमादित्य अपनी दोनों रानियों और ढेर सारे उपहारों के साथ उज्जैन वापस आए और राजकार्य संभाल लिया।

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